Milkha Singh Biography in Hindi | मिलखा सिंह की जीवनी

Milkha Singh Biography in Hindi – अक्सर हमारे बुजुर्ग, शिक्षक कहते हैं, भाग्य के सिकंदर हो। लेकिन भाग्य का सिकंदर कौन है? जिसने अपने भाग्य को जीत लिया है। हमारे “फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह” की तरह जो आज हमारे बीच नहीं है, उनका मानना ​​था कि जीवन, हाथों की रेखाओं से नहीं बनता, उसमें हमारा भी एक बड़ा योगदान होता है।

उनके जीवन के कुछ पहलुओं, घटनाओं पर प्रकाश डालते हुए। तो, आइए एक नजर डालते हैं। दोस्तों, एक महान धावक (Runer) बनने से पहले, मिल्खा सिंह का जीवन कांटों से भरा था। उनका जन्म 20 नवंबर 1929 को आगरा में गोविंदपुरा, मुजफ्फरगढ़, पाकिस्तान में सिख राठौर परिवार मे हुआ था,

उनके माता-पिता गरीब थे, दो कमरे के मकान में रहते थे, जिसमें एक कमरा जानवरों के लिए था, दूसरे में पूरा परिवार रहता था। उनके माता-पिता के पंद्रह बच्चे थे, जिनमें से कुछ की बहुत कम उम्र में मृत्यु हो गई। भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की आग में उनके सात भाई-बहन तथा माता-पिता की हत्या कर दी गई और उनकी आंखों के सामने जला दिया गया।

वो कहते थे कि इस दर्दनाक दृश्य के कारण, जीवन में पहली बार मैं फूट-फूट कर रोया, अपनों को खोने का गम, जीवन भर उनको सताता रहा।

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Milkha Singh Age, Death, Wife, Children, Family, Biography in Hindi

Real Name: Milkha Singh
Nickname: The Flying Sikh
Height (approx.) in centimeters:  178 cm
in meters: 1.78 m
in feet inches: 5’ 10”
Weight (approx.) in kilograms: 70 kg
Date of Birth:

  • 20 November 1929 (according to records in Pakistan)
  • 17 October 1935 and 20 November 1935 (other official records of various States)

Birthplace: Govindpuri, Muzaffargarh city, Punjab Province, British India (now Muzaffargarh District, Pakistan)
Date of Death: 18 June 2021
Place of Death: PGIMER, Chandigarh
Age (at the time of death): 91 Years
Death Cause: COVID-19
Hometown: Chandigarh, India
Nationality: Indian
Family Father: Name Not Known
Mother: Name Not Known
Siblings: Ishar (sister), Makhan Singh (eldest brother) & 12 More
Religion: Sikhism
Hobbies: Playing Golf, Walking, Doing Work-outs

उनकी उपलब्धियां –

  • 1958 के एशियाई खेलों में 200 मीटर और 400 मीटर में स्वर्ण पदक।
  • 1958 जापान राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक।
  • 1958 कटक राष्ट्रीय खेल में 200 और 400 में स्वर्ण पदक।
  • 1964 कलकत्ता राष्ट्रीय खेल में 400 मीटर में रजत पदक।

भारत के महान धावक (Runer) मिल्खा सिंह ने कहा था, कि उनके पिता जी के अंतिम समय के शब्द थे – “भाग मिल्खा भाग” और उनको मुल्तान (पाकिस्तान के पंजाब सूबे में एक शहर है।) भाग जाने को कहा, जहां उनके बड़े भाई माखन सिंह रहते थे। दंगाइयों ने उनका पीछा किया, वह महिला डिब्बे में सीट के नीचे छिप गये और महिलाओं से नहीं बताने का अनुरोध किया।

बंटवारे की घमासान में, एक शरणार्थी के रूप में ट्रेन से वह अंततः पाकिस्तान से भारत आ गये, उस समय दिल्ली में हैजा हुआ था। उन्होने हजारों शरणार्थियों के साथ, लगभग तीन सप्ताह रेलवे ट्रेन में बिताए। इस समय, आशा की एक किरण चमकी, जब उनकी बड़ी बहन ईशर के नाम की घोषणा हुई।

इसके बाद पुराने किले के शरणार्थी शिविर की ओर गये, उनके परिवार के केवल चार सदस्य ही बचे थे, बड़े भाई माखन सिंह, भाभी, बड़ी बहन और मिल्खा सिंह। रिफ्यूजी कैंप में रहने के बाद, दिल्ली के शाहदरा इलाके में एक बसी बस्ती में रहने लगे, यह महान संघर्षों से भरा दिन था।

जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश में, जूते पॉलिश किए, ढाबों पर बर्तन साफ ​​किए, उन्होने एक सफाई की दुकान पर काम किया। जिसके लिए उन्हें 10 रुपये महीने का वेतन मिलता था। साथ ही उन्होंने 9वीं कक्षा में भी दाखिला लिया, लेकिन जीवन का संघर्ष पढ़ाई में आड़े आया।

मिल्खा सिंह को एक बार गिरफ्तार किया गया था, इसलिए कि वह बिना रेलवे टिकट के यात्रा कर रहे थे। जमानत के लिए बहन को अपने जेवर बेचने पड़े, इतने भयानक बचपन के बाद, उन्होने अपने जीवन में कुछ बड़ा करने का फैसला किया। अपने भाई माखन सिंह के कहने पर वो 1952 में सेना में शामिल हो गए।

इसी दौरान एक रेस होने वाली थी, जिसमें उन्होंने भाग लिया। अपने कौशल को निखारा और खुद को 200 मीटर और 400 मीटर में स्थापित किया और कई प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल की है, और एक धावक (Runer) के रूप में अपनी पहचान बनाई।

मैरे भाई, मिल्खा सिंह में दौड़ने का हुनर ​​अचानक नहीं आया, बल्कि बचपन से ही दौड़ रहा था, वो भी चिलचिलाती रेत पर, और यह जुनून और अनुभव बाद में काम आया। इसकी शुरुआत कोट अडू गांव से होती है। जब वो 5वी कक्षा में अध्ययन किया करते थे, उनका स्कूल घर से 10 कि.मी. दूर था, वह रोज घर से स्कूल तक दोस्तों के साथ नंगे पांव दौड़ते थे, वह भी मई-जून के महीने में चिलचिलाती रेत पर।

मिल्खा जी कहते हैं, कि इससे उन्हें कम उम्र में सहनशक्ति बढ़ाने में मदद मिली।

भारत के लिए उन्होंने 80 अंतरराष्ट्रीय दौड़ में भाग लिया और 77 जीते। वह स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय थे।  

उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। 

1959 में भारत का चौथा सर्वोच्च पुरस्कार मीला।

और इस तरह वे भारत के सफल धावक (Runer) बन गए।

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